| 18-08-2026 |
धार्मिक मान्यता के अनुसार, तब से तक्षक नाग महाकाल वन में इसी स्थान पर रहते हैं। उनकी एकांत साधना में बाधा न हो, इसलिए मंदिर वर्षभर बंद रखा जाता है। नागपंचमी को ही श्रद्धालुओं को उनके दर्शन का अवसर मिलता है।

एक ओर वर्ष में एक बार खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मंदिर में 10लाख से अधिक भक्तों ने दर्शन किए, तो दूसरी ओर महाकाल की राजसी सवारी में दो लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए। पूरे दिन मंदिर और सवारी मार्ग पर भक्ति का उल्लास छाया रहा। श्रावण के तीसरे सोमवार और नागपंचमी के महासंयोग पर सोमवार को उज्जैन में आस्था का विराट दृश्य देखने को मिला। ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर में भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु पहुंचे, वहीं शाम को भगवान महाकाल की तीसरी सवारी निकली।
एक ओर वर्ष में एक बार खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मंदिर में 10 लाख से अधिक भक्तों ने दर्शन किए, तो दूसरी ओर महाकाल की राजसी सवारी में दो लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए। पूरे दिन मंदिर और सवारी मार्ग पर भक्ति का उल्लास छाया रहा। रविवार-सोमवार की मध्य रात्रि से शुरू हुआ भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन का सिलसिला सोमवार रात 12 बजे तक चला। करीब तीन किलोमीटर क्षेत्र में बनाए गए अलग-अलग होल्डिंग क्षेत्रों में श्रद्धालुओं को रखा गया और पुलिस, प्रशासन तथा सुरक्षा गार्डों ने निर्धारित चलायमान व्यवस्था के माध्यम से दर्शन कराए।
मंदिर की परंपरा के अनुसार दोपहर 12 बजे भगवान नागचंद्रेश्वर की शासकीय पूजा हुई। शाम 7.30 बजे भगवान महाकाल की संध्या आरती के बाद मंदिर के पुजारी और पुरोहितों ने भगवान नागचंद्रेश्वर की पूजा-अर्चना की। रात 12 बजे महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से पूजा के बाद मंदिर के पट एक वर्ष के लिए फिर बंद कर दिए गए। शिखर पर चढ़ाया नया ध्वज नागपंचमी के अवसर पर महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से मंदिर के शिखर पर नया ध्वज भी चढ़ाया गया। यह धार्मिक परंपरा भी दिनभर के आयोजन का प्रमुख हिस्सा रही।
नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट नागपंचमी पर ही 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। मान्यता के अनुसार नागराज तक्षक ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें अमरत्व का वरदान दिया। इसके बाद तक्षक ने शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा जताई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तब से तक्षक नाग महाकाल वन में इसी स्थान पर रहते हैं। उनकी एकांत साधना में बाधा न हो, इसलिए मंदिर वर्षभर बंद रखा जाता है। नागपंचमी को ही श्रद्धालुओं को उनके दर्शन का अवसर मिलता है।