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29 Jun, 2026

ग़ज़ल

रिश्तों की अहमियत को समझता ही नहीं है। उससे हमारा 'मिलना-मिलाना' फ़िजूल है।। सुबह से लेके शाम हुयी इंतज़ार में। अब और वक़्त अपना गंवाना फ़िजूल है।।

नदिया के उस किनारे पे जाना फ़िजूल है।
उसका हरेक़ 'वादा'-'बहाना' फ़िजूल है।।
रिश्तों की अहमियत को समझता ही नहीं है।
उससे हमारा 'मिलना-मिलाना' फ़िजूल है।।
सुबह से लेके शाम हुयी इंतज़ार में।
अब और वक़्त अपना गंवाना फ़िजूल है।।
जो कुछ भी हो चुका है उसे भूल जाइये।
अब और अपने दिल को जलाना फ़िजूल है।।
चेहरे की इस उदासी में,नफ़रत की आग है।
कदमों में उसके सर को झुकाना फ़िजूल है।।
कब तक यूँ नखरे उनके उठाते रहेंगे हम।
रूठे हुओं को अब तो मनाना फ़िजूल है।।
उसने पलट के देखा भी तो इक नज़र नहीं।
अपना समझ के दिल को लगाना फ़िजूल है।।
उसने तो गांठ बाध ली वो अब ना आएगा।
चाहत ही नहीं जब तो मनाना फ़िजूल है।।
उसकी नज़र इधर को ठहरती ज़रा नहीं ।
'तन्हा' ग़ज़ल ये अपनी सुनाना फ़िजूल है।।
                                -सलीम तन्हा