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07 Oct, 2025

मंज़र

दुनिया को तू ने देखा है खिड़की से झाँक कर इक रोज़ अपने घर से निकल कर भी देख ले

मौसम हरा-भरा है ये मंज़र भी देख ले

कुछ देर ताज़गी में सँवर कर भी देख ले

सच बात कहने के लिए अपनी ज़बाँ तो खोल

फिर किस तरफ़ से आते हैं पत्थर भी देख ले

माना कि तिश्नगी किसी सहरा की देन है

फ़य्याज़ किस क़दर है समुंदर भी देख ले

तू ने बला की धूप में काटी तमाम उम्र

अब सर्द शब की ओढ़ के चादर भी देख ले

दुनिया को तू ने देखा है खिड़की से झाँक कर

इक रोज़ अपने घर से निकल कर भी देख ले

काँटों का ताज सर पे लिए क्यों सलीब पर

है आज़माइशों में पयम्बर भी देख ले

नाम-ए-'सबा' हथेली पे अपनी कभी सजा

ताकि ज़माना उस का मुक़द्दर भी देख ले

सब बिलग्रामी