Vaagmi
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साहित्य
ab kare to kya kare

अब करें तो क्या करें

कुर्सियों को देखकर फिर, हो गए मिस्टर अलग।

हो नहीं सकता तुम्हारी, सोच से बंदर अलग।।

  दे रहे दोनों धड़ो को, वो बराबर असलहे,

मौत के होते नहीं है, नीच सौदाग़र अलग।

  क़ैद नर्सिंग होम में हैं, अब करें तो क्या करें,

ख़र्च की चिन्ता अलग है, मौत का है डर अलग।  

जंग यूँ जारी रही तो, रोएगी इंसानियत,

हो नहीं सकता तबाही, का कभी मंज़र अलग।  

क्षेत्र, भाषा, जातियों में, बंट गया है दर्द भी,

हो गए इंसानियत की, नाप के मीटर अलग।

  लोकसेवा का जुनूँ था, था फ़क़ीरों सा मिज़ाज़,

पूर्व के लीडर अलग थे, आज के लीडर अलग।  

सोचते अपने तरीक़े से सभी, हर बात को,

हर किसी का है निराला, सोच का स्तर अलग।                          

                            डॉ. सुनील त्रिपाठी निराला