Vaagmi
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साहित्य
कुर्सियों की चाह में, करते रहे हैं दलबदल, और यह कहते रहे, मज़बूरियों में आ गए।
दे रहे दोनों धड़ो को, वो बराबर असलहे, मौत के होते नहीं है, नीच सौदाग़र अलग।
ये राहतें हैं उन्हीं की दुआओं का समरा है ज़िन्दगी मेरी आबाद, लिख रही हूँ मै
कैफ़' बता क्या तेरी ग़ज़ल में जादू है बच्चा बच्चा तेरा दिवाना लगता है
वो मेरे दिल की सब बातें मुझी से जान लेते हैं है उन के दिल में क्या जब पूछता हूँ रूठ जाते हैं
अफ़सोस इस बात का है, कि तूने अपनी मंज़िल पाकर, मेरे हवाले एक कोना कर दिया
जवाब जिनके फ़क़त पास में हों तेरे ही, है इम्तिहान तो बस वो सवाल दे मुझको।
लडाई का न कोई ओर है ना छोर है कोई, हमी इसमें नहीं ,दुनिया का इक इक देश शामिल है।
कई लड़कों के कांधों पर घरों का बोझ होता है सभी को प्यार करने की सहूलत मिल नहीं पाती
हवा से पानी गुपचुप जो मिलता रहता, मिट्टी के शक़ और भी पुख़्ता हो जाते।
न जाने कौन सी गंगा, नहाकर आए थे सारे, कि सारा गाँव कह उट्ठा, उन्हें निर्मल सबेरे ही।
नाहक़ ही परेशान हो, मेरे उरूज़ से , ख़ुशबू की तरह ज़द में , समाने के नहीं हम .
आज अगर अहबाब हमारे हमको ही डसते हैं तो क्या , यह जहरीले नाग तो "नासिर" हमने खुद ही पाले हैं ।
हैं मिलावटख़ोर हावी, धन कमाने के लिए, हो रहीं हैं साजिशें अब, ज़िन्दगानी के ख़िलाफ़।
हम को तो दर्द-ए-जुदाई से ही मर जाना था चंद रोज़ और न क़ातिल को इशारा करते
इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी बिजली सी घटाओं में, ख़ुशबू सी हवाओं में
वकालत खूब करते हो मियां रोशन ख़यालों की तुम्हीं ने क़ैद में रख्खा है औरत को ज़मानों से
भूखे को चार रोटियां, तो दे नहीं सके , भाषण तो भुखमरी पे,सभाओं को दे दिया
तूफ़ान भी रस्ता छोड़ेगा, मजबूत सफ़ीना साथ में है। जब मौत को देखा तो पूछा , ये कौन हसीना साथ में है।
लिखी 'नियाज़' ने भी ये नज़्म चाट खा कर, तुम भी सुनाओ बच्चों सब को ये नज़्म गा कर
बूढी माँ,बिरजू और धन्नो,पनघट ,खेत और मंदिर, भूले से तुम जुबां पे अपनी नाम न इनका लाना हो.
मज़लूम की सदा से न आ जाए इंक़लाब इतना ज़ियादा ज़ुल्म भी ढाया नहीं करो
ये मय-कदा है वो मस्जिद है वो है बुत-ख़ाना कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं
दुखियारों का देश है बाबा व्यस्त रहो दुःख-दर्दों में, मुट्ठी जो भूले से तानी तो फिर देश निकाले हैं.
दुखियारों का देश है बाबा व्यस्त रहो दुःख-दर्दों में, मुट्ठी जो भूले से तानी तो फिर देश निकाले हैं.
अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा
नहीं बिकता हूँ मैं बाज़ार की मैली नुमाईश में, ज़माने में मुझे तो बस मेरे हक़दार पढ़ते हैं .
कभी बनके मैना, कभी बनके कोयल, घरों आंगनों में उछलती हैं बेटी.
मुफ़्लिस बंदों पर मत हँसना धन-दौलत के पहरेदारो ये दुनिया है इस दुनिया की हर शय आनी-जानी है
गर हवाएं इस तरह बेख़ौफ़ हो आती रहीं, घर तुम्हारा आँधियों का रास्ता हो जाएगा .
दिल हज़ारों का तोड़ने वाले, हमसे कहते हैं दिल लगाने को.
मेरा चेहरा लगा के जिसने सारी उम्र बिता डाली, मुझको क्या मालूम था वो भी धोका करने वाला था.
ये हिज्र-ए-यार ये पाबंदियाँ इबादत की किसी ख़ता की सज़ा है ये ज़िंदगी तो नहीं
ये जो फूलों का नगर था इस में ही काँटों से अब भर गया हर एक आँगन आँधियों धीरे चलो
अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था
मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था
ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए
मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है
इक आप का दर है मेरी दुनिया-ए-अक़ीदत ये सजदे कहीं और अदा हो नहीं सकते
गर सर न झुकाओगे तो प्यासे ही मरोगे। दरिया हैं उन्ही के ये समंदर हैं उन्ही के।
कितनी जद्दो जहद के बाद भी वो, एक नन्हीं सी जान बदलेगा.
संजो रक्खी हैं दिल में क़ीमती यादें मगर फिर भी बस इक नाज़ुक सी ठोकर से ये लॉकर टूट जाता है
रह रह के न तड़पाओ ऐ बेदर्द मसीहा हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यों नहीं देते ?
इस दर्जा पशेमाँ मिरा क़ातिल है कि उस से महशर में मिरे सामने आया नहीं जाता
रईस-ए-शहर को मैं जानता हूँ कोई उम्मीद तुम उस से न रखना
जो किरन थी किसी दरीचे की मरक़ज-ए-बाम हो रही है अब
वो लोग बे-अदब थे 'कँवल' बे-ख़ुलूस थे हम जैसे बे-ज़बान सलामत नहीं रहे
मैकदा खोल आ गए साक़ी। जितने बदनाम आने वाले थे।
लगता है जड़ें फैल गयी हैं मेरी तुझ में उखड़ी तो कहीं फूलने फलने की नहीं हूँ
एक औरत का धड़ भीड़ में भटक रहा है उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं