Vaagmi
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साहित्य
booth per kabja jamaya

गुमनाम

इसलिए ये लोग इतने, रैलियों में आ गए। भुखमरी का दौर है सो, रोटियों में आ गए।।   जो थे निगरानी शुदा, वो पा गए हैं कुर्सियां, जो कभी गुमनाम थे वो, सुर्खियों में आ गए।   कल तलक जो धर्म का, झंडा लिए थे मंच पर, पोल जब उनकी खुली तो, दागियों में आ गए।   बूथ पर कब्ज़ा जमाया, बांट दी दारू, रकम, गांव भर के वोट उनकी, पेटियों में आ गए।   हम बहुत अच्छे थे, जब तक हां में हां करते रहे, बात जब हक़ की उठाई, बागियों में आ गए।   कुर्सियों की चाह में, करते रहे हैं दलबदल, और यह कहते रहे, मज़बूरियों में आ गए।