Vaagmi
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साहित्य
eent ka rang lal

ईंट का रंग लाल क्यों

 बिछाने में लगे हो तुम, सियासत की बिसातों को।

युवाओं में बग़ावत है, नहीं है काम हाथों को।।  

 

 

तुम्हारे मुंह से बातें, एकता की अब नहीं जचतीं

, तुम्हारी सोच के घर में, जगह है सिर्फ़ जातों को।  

 

 

समर में जीतकर बाज़ी, परेशांहाल फिर भी हो,

सफलताओं का पैमाना, बनाया तुमने घातों को।  

 

 

गज़ब बहुरूपियापन, हो गया शामिल सियासत में,

कि रहबर बन गये दिन में, बने सय्याद रातों को। 

 

यहां सब आज अपने ही, लहू के हो रहे प्यासे,

पढ़ाया पाठ तुमने किस तरह, का इन ज़मातों को।  

 

कभी सोचा निराला, ईंट का रंग लाल क्यों होता,

समझ आ जाएगा देखो, श्रमिक के श्वेत हाथों को।                                  

 

                                 डॉ. सुनील त्रिपाठी निराला