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छत्तीसगढ़
mettal art of baster

बस्तर की पहचान के चितेरे - जयदेव बघेल

  जयदेव बघेल के घर की बाहरी सज्जा ,यह घर उन्होंने १९८९ में बनवाया था। इसमें लगा सूर्य का मुखौटा और अन्य आकृतियां उनकी स्वयं की बनाई हुई हैं। जयदेव बघेल भारतीय आदिवासी कला के उन अग्रणि कलाकारों में से एक थे जिन्होंने अपने क्षेत्र की अल्पज्ञात कलाओं को देश एवं विश्व पटल पर प्रसिद्धी दिलाने में मत्वपूर्ण भूमिका निबाही थी।तत्कालीन मध्यप्रदेश और वर्तमान छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे धुर आंतरिक अंचल के निवासी जयदेव बघेल का जन्म सन १९५० में ,कोंडगांव के एक पारम्परिक धातुशिल्पी, घढ़वा परिवार में हुआ था। उनके पिता सिरमन बघेल अपने समय के बस्तर के उन गिने –चुने धातु शिल्पियों में से एक थे जो देवी –देवताओं की मूर्तियां बनाने की क्षमता रखते थे।इस प्रकार जयदेव का आरम्भिक जीवन और धातुशिल्प का शुरूआती प्रशिक्षण उनके पिता की देखरेख में हुआ। वे कभी स्कूल नहीं गए , बचपन में वे अपने पिता के साथ अपना पैतृक धातु शिल्प का कार्य करते थे और कोंडागांव स्थित दण्डकारणी कार्यालय में चौकीदार का कार्य करते थे। यहाँ बंगाली कर्मचारियों के बीच रहकर वे पढ़ना -लिखना सीख गए। दंडकारण्य योजना की अवधारणा देश की आज़ादी और विभाजन के तुरंत बाद १९४७ में ही बन गयी थी पर भारत सरकार ने १९५८ में एक क़ानून पास करके इसे प्रभावी ढंग से लागू करना आरंभ किया। इस योजना के अंतर्गत पूर्वी बंगाल के विस्थापितों का पुनरस्थापन इस तरह करना था की उस क्षेत्र का एकीकृत विकास वहां के स्थानीय आदिवासियों के हितों की रक्षा क साथ किय जाय। १९६१ तक इस योजना के तहत बस्तर में बंगाली शरणार्थियों का पुनर्स्थापन एवं दंडकारण्य योजना का कार्यालय स्थापित हो चुका था। इस योजना से बस्तर के एकीकृत विकास का क्या हुआ कहना कठिन है, पर इस योजना से सम्बद्ध अधिकारियों की कलाप्रियता और कला दृष्टि ने बस्तर की आदिवासी कला परंपरा पर बहुत गहरा असर डाला। बस्तर की स्थानीय कला को व्यावसायिक रूप देने और देश के बाहरी भागों में लोकप्रिय बनाने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। जगदलपुर दंडकारण्य योजना कार्यालय में प्रशासक के पद पर कार्यरत अरुण गुहा ने बस्तर में आदिवासी कला का पहला व्यवसायिक संस्थान 'डांसिंग कैक्टस' आरम्भ किया। उन्होंने यहाँ के आदिवासियों की काष्ठकला को पहचाना और उसे व्यवसायिक स्तर पर बेचने के लिए दीवार पर सजाने के लिए पैनल बनवाना आरम्भ किया। आज काष्ठकला के जो पैनल , माड़िया युगल , सल्फी झाड़ पर चढ़ता आदिवासी, पेड़ के नीचे बैठी आदिवासी युवती आदि बाजार में बिक रहे हैं , वे और अनेक सजावटी आइटम अरुण गुहा द्वारा विकसित की गयी काष्ठकलाकृतियाँ हैं। इसी प्रकार १९६१-६२ में जगदलपुर दंडकारण्य योजना में पदस्थ एक शीर्ष अधिकारी सुकुमार सेन कोंडागांव में जयदेव के पिता सिरमन बघेल का काम देखने आए। वे उनकी कला से बहुत प्रभवित हुए और उनके माध्यम से यह बात कोलकाता के उच्चाधिकारी वर्ग में चर्चित हो गयी। वहां के पुलिस कमिशनर की बेटी मीरा मुखर्जी १९६३ में जब जर्मनी से मूर्तिकला का अध्ययन कर भारत लौटीं तो वे बस्तर आकर सिरमन बघेल,से घढ़वा धातु कला सीखने लगीं। इस प्रकार सिरमन बघेल और बस्तर की धातु मूर्तिकला की प्रसिद्धि बस्तर से बाहर फैलने लगी। मीरा मुखर्जी ,जयदेव बघेल के लिए बस्तर से बाहरके कला जगत की पहली संपर्क सूत्र थीं। सन १९६३-६४ में कमला देवी चट्टोपाध्याय बस्तर आयीं और यहाँ कलाकारों का सर्वेक्षण कराया ,अन्य कलाकारों के साथ जयदेव के पिता सिरमन बघेल का नाम कलाकारों की सूची में अग्रणी था। इस सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद ही सरकार द्वारा बस्तर की आदिवासी कला के उत्थान के अनेक प्रयास किये जाने लगे। १९६९ में मानिक घढ़वा और १९७० में सुखचंद घढ़वा को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रिय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस समय जयदेव बघेल की आयु लगभग बीस वर्ष रही होगी। १९७० में जयदेव बघेल , सुखचंद घढ़वा और अपने पिता सिरमन बघेल के साथ पहली बार दिल्ली आये। यहाँ उनकी पहचान कॉटेज़ एम्पोरियम की तत्कालीन संचालिका जसलीन धमीजा से हुई और उन्होंने बस्तर के इन तीनों धातु शिल्पियों की पहचान अपनी चेयरपर्सन पुपुल जयकर से करवाई। इस प्रकार युवा कलाकार जयदेव बघेल का दिल्ली के कला जगत में प्रवेश हुआ। १९७० के दशक में वे भोपाल और दिल्ली के समकालीन कलाकारों ,कलापारखियों और कला के क्षेत्र में सक्रीय शोधकर्ताओं के संपर्क में आये।इसका एक मुख्य कारण तो यह था कि उस समय के वास्तविक आदिवासी बस्तर में पढ़ा -लिखा एवं अच्छी तरह अपनी बात कह सकने वाला कोई स्थानीय कलाकार नहीं था। जयदेव न केवल देशी लोगों बल्कि विदेशी लोगों से भी किसी प्रकार सम्प्रेषण स्थापित कर ही लेते थे। उनका यह गुण उनकी तरक्की का सबसे बड़ा कारक बना।दूसरे उनका निवास भी मुख्य सड़क के पास कोंडागांव में था जो ऐसी महत्वपूर्ण जगह थी कि बस्तर जाने वाले प्रत्येक बाहरी व्यक्ति को वहां से होकर ही बस्तर में प्रवेश करना पड़ता था। यह वह समय था जब कला बाजार और शोधकर्ताओं का बस्तर की आदिवासी कला के प्रति आकर्षण चरम पर था। देशी -विदेशी संग्रहकर्ता बस्तर के धातु शिल्प के पुराने नमूनों और कलाकृतियों को किसी भी कीमत पर लेने को तैयार रहते थे। विदेशी संग्रहालयों और संग्रकर्ताओं को बस्तर के किसी स्थानीय स्रोत की तलाश थी जो बस्तर की पुरानी कलाकृतियों को उपलब्ध करा सके ,उनकी प्रामाणिकता जाँच सके उनके सन्दर्भ के बारे में बता सके अथवा उनकी पहचान कर सके। देश में उस समय देशज एवं आदिवासी कलाओं और कलाकारों के उत्थान के लिए अनेक कार्यक्रम आरम्भ हो रहे थे ,इस आशय की पूर्ती के लिए अनेक संस्थाओं और समितियों का गठन हो रहा था। प्रशासनिक अधिकारीयों को ऐसे आदिवसी कलाकार चेहरों की तलाश थी जिन्हे आगे रखा जा सके। इन सब परिस्थियों का लाभ बस्तर क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में जयदेव बघेल को मिला। दिल्ली में उनके संपर्क राजीव सेठी , जसलीन धमीजा , पुपुल जयकर ,गुलशन नंदा जैसे विद्वानों और भरानी जैसे एंटीक डीलरों से बने। बस्तर की कला में रूचि रखने वाले जर्मन दूतावास के कुछ अधिकारीयों और जर्मन शोधकर्ताओं से उनका परिचय हुआ। इस सब का परिणाम यह हुआ की वे दिल्ली के कला जगत में बस्तर के लोकप्रिय आदिवासी धातु शिल्पी और विशेषज्ञ संपर्क सूत्र स्थापित हो गए। जयदेव बघेल ने बस्तर में पहले-पहल आधुनिक मशीनों जैसे वेल्डिंग मशीन , ग्राइंडर , कटर आदि का प्रयोग आरम्भ किया। उन्होंने अपनी पारम्परिक धातु ढलाई पद्यति से आधुनिक मूर्ति शिल्प भी बनाये जिन्हें ललित कला अकादेमी , नई दिल्ली की नेशनल एग्जीबीशन और मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में प्रदर्शित भी किया गया। सन १९७५-७६ में जयदेव बघेल की धातु मूर्तियों की एकल प्रदर्शनी कोलकाता में आयोजित हुई जिसका उद्घाटन मीरा मुखर्जी ने किया था ।पर इस क्षेत्र में उन्हें वांछित सफलता प्राप्त नहीं हुई। सन १९८० के दशक में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत भवन की स्थापना हो रही थी। देश में भारत महोत्सवों की धूम थी। लोक एवं आदिवासी कलाकारों के लिए तो वह समय एक स्वर्णिम काल था। इस समय जयदेव बघेल प्रख्यात चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन और प्रसिद्ध कला प्रशासक अशोक वाजपई के संपर्क में आए इससे उन्हें राज्य के कला जगत में स्थान बनाने का अवसर मिला। बस्तर में आने वाले विदेशी शोधकर्ताओं और कला प्रेमियों के लिए जयदेव उस समय एक मात्र स्थानीय सूत्र थे। उन्होंने इस सबका भरपूर लाभ उठाया। सन १९८२ में, भोपाल में भारत भवन के उद्घाटन के अवसर, पर तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से सम्मान ग्रहण करते जयदेव बघेल। इस दशक में वे बस्तर और यहाँ की आदिवासी कला के सर्वमान्य प्रतिनिधि एवं प्रवक्ता के रूप में स्थापित हो चुके थे। जयदेव बघेल को १९७७ में राष्ट्रिय पुरस्कार मिला। उनसे पहले माणिक घढ़वा और सुखचंद घढ़वा को धातु शिल्पकला में राष्ट्रिय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका था ,पर वे जल्द ही गुमनामी में खो गए। माणिक घढ़वा और सुखचंद घढ़वा कहीं अधिक दक्ष और प्रतिभावान शिल्पी रहे परन्तु जयदेव बघेल की प्रसिद्धि की चमक में बस्तर के शेष घढ़वा कभी उभर ही नहीं सके। जयदेव बघेल ने बस्तर की घढ़वा धातु शिल्प कला पर लेखन और व्याख्यान भी किये। इंद्रावती नामक पुस्तक में बस्तर के धातु शिल्प पर उनका लिखा आलेख काफी चर्चित हुआ। लेखन के माध्यम से उन्होंने घढ़वा धातु ढलाई के उदभव के बारे एक स्वयं रचित किंवदंती को प्रचारित करने का प्रयास किया था। जयदेव बघेल ने बस्तर के शिल्पियों को एकजुट करने का भी प्रयास किया था। उन्होंने 'पारम्परिक बस्तर शिल्पी परिवार' नामक एक स्वयं सेवी संस्था का भी गठन किया और शासकीय सहयोग से कोंडागांव में शिल्पग्राम बनाने का भी कोशिश की थी। जयदेव बघेल की सोच अपने समय के अन्य आदिवासी कलाकारों से बहुत अलग थी वे समुदायगत परम्परा के हिमायती तो थे परन्तु उसमे व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और प्रयोगधर्मिता के प्रबल पक्षधर भी थे।उस समय बस्तर के अधिकांश शिल्पी परम्परागत रूपाकारों के निरूपण तक ही सीमित थे। सन १९७० तक बस्तर की विभिन्न कलाविधाओं की कलाकृतियों का व्यावसायिकरण हो चुका था और वे अपने अनुष्ठानिक ढाँचे से बाहर निकल रहीं थीं। पर अधिकांशतः कलाकृतियां जो पहले अनुष्ठानों में प्रयुक्त की जा रहीं थीं उन्हें ही शहरी बाजार में सजावट हेतु बेचा जाने लगा था। कोई नया उत्पाद या रूप नहीं घढ़ा गया था। जयदेव ने अभिव्यक्ति के स्तर पर , अपने में बसे पारम्परिक कलाकार को चुनौती दी थी। उन्होंने जैसे स्वयं को ललकारा था कि अपनी सामुदायिक कला में तुम्हारी अपनी पहचान कहाँ है ? उन्होंने बस्तर दशहरा उत्सव पर निकली जाने वाली रथ यात्रा को दर्शाने वाला एक विलक्षण मूर्ति शिल्प तैयार किया। यह एक पारम्परिक घढ़वा कलाकार द्वारा बनाया गया अद्भुद मूर्तिशिल्प था जिसमे किसी एक चरित्र को नहीं बल्कि पूरे आयोजन को दृश्यबद्ध किया गया था। यह एक अलग ही अवधारणा को व्यक्त करने वाली कलाकृति थी जिसमें जयदेव की सृजनात्मक कल्पनाशीलता और तकनिकी कौशल का अद्भुद संगम देखने को मिलता है।जयदेव बघेल की आदिवासी कला को सबसे बड़ी देन यही थी कि उन्होंने पारम्परिक कलाओं में भी एक कलाकार की व्यक्तिगत रचनाधर्मिता को रेखांकित करने का सूत्रपात किया।जयदेव बघेल ने ग्रामीण पारम्परिक कलाकारों एवं आधुनिक शहरी कलाकारों के मध्य एक सेतु का कार्य किया और उनके मध्य संवाद की स्तिथि को संभावित बनाया। वे वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के ऐसे पहले पारम्परिक कलाकार थे जिसे किसी विश्व विद्यालय (रविशंकर विश्व विद्यालय , रायपुर) ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया था। उन्हें मध्य प्रदेश राज्य सरकार द्वारा शिखर सम्मान एवं भारत सरकार द्वारा राष्ट्रिय पुरस्कर तथा शिल्पगुरु की उपाधि से सम्मानित किया था। १९७८ में भारत सरकार के फिल्म्स डिवीज़न ने उन पर आधारित एक वृत्तचित्र बनाया था। सन १९८२ में आर्ट काउन्सिल ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन और बी. बी. सी. लन्दन द्वारा उन पर केंद्रित वृत्तचित्र बनाये गए। सन १९८७ में स्विट्जरलैंड के बाज़ल म्यूजियम द्वारा उन एक वृत्तचित्र बनाया गया। उनका निधन सन २०१४ में हुआ। मुश्ताक खान